Saturday, November 1, 2008
Wednesday, October 1, 2008
जब लाश छिपाने निकली मैं...!
- सौदामिनी
सपने जैसे भी हों, बहुत खूबसूरत होते हैं क्योंकि वो हमारी शख़्सियत का आईना होते हैं। अच्छा-बुरा, सच्चा झूठा कुछ सुलझा-कुछ उलझा, कोई डरावनी तो कोई फैंटसी से भरा सपना। सपने में कौन-कौन सी चीजें कहां से आकर जुड़ जाती हैं, सोचकर हैरानी होती है। मज़े की बात ये कि सपने देखते वक्त हम पूरी तरह संजीदा होते हैं।हम उस दुनिया के बाशिंदे बन जाते हैं जहां कहीं भी कभी भी कुछ भी मुमकिन है। सपनों की दुनिया तब कितनी सच होती है।
मैंने कितनी ही बार सपनों में सांप देखे हैं। रास्ते में सांप, नदी पार करते वक्त ढेर सारे सांप, महल में सांप यहां तक कि कमरे में रखे एक्वेरियम में भी सांप। दरअसल सांपों को लेकर मेरे मन में बहुत कौतुहल है, सिर्फ सांप ही नहीं बल्कि भयानक लगने वाले सारे जीव-जंतुओं के बारे में जानने के लिए मैं उत्सुक रहती हूं। शायद इसीलिए इस तरह के सपने देखती हूं।
एक और सपना जिससे मैं बचपन में अक्सर डर जाया करती थी, वो था लाशें देखने का। मौत से शायद तब मैं बहुत ज़्यादा डरती थी। सपने में मुझे अक्सर घर में रखी लाशें दिखती थीं। कभी दिखता था कि घर में लाशें छिपाई जा रही हैं, कभी दिखता था कि घर में मर्डर हो गया या होने वाला है। तब दीवार पर लगा टेडीबियर मुझे भूत नज़र आने लगता था। एक बार तो रात को डर जाने पर मैंने मंदिर की दीपक जला दिया था और फिर अक्सर ऐसा करने लगी तब तक जब तक कि मुझे इसके लिए डांट नहीं पड़ गई। कभी कभी सपने में डर जाने पर मुंह से आवाज़ भी नहीं निकलती थी। वक्त के साथ साथ ये डर दूर हो गया।
मुझे यकीन है कि अब इस तरह के सपने मुझे नहीं आएंगे। वो इसलिए क्योंकि अब मैं मीडिया में हूं। रोज़ ही इतनी सारी मनहूस ख़बरों से साबका पड़ता है कि वो मेरे लिए काम का हिस्सा बन चुकी हैं। मेरे विश्वास की तस्दीक करता है वो सपना जो मैंने हाल ही में देखा था। खूनखराबा देखकर अक्सर डर जाने वाली मैं अपनी दोस्त के साथ इधर-उधर भटक रही थी। पूछिए क्यों- इसलिए क्योंकि मेरे चाचा ने किसी का मर्डर कर दिया था और हम उन्हें जेल जाने से बचाने के लिए लाश छिपाने के मकसद से दर-दर भटक रहे थे। एक आदमी का क़त्ल हुआ था और लाश इतनी हल्की और छोटी थी कि हम उसे आटा गूथने वाले थाल में रुमाल से ढककर सरपट दौड़े जा रहे थे। हत्या मेरे गांव (औरेया)के मुहल्ले में हुई थी। चारों तरफ पुलिस उसकी तलाश में फैलती जा रही थी और उनके चीफ थे वो शख़्स जो वास्तव में मेरे सहकर्मी है। भागते-भागते हम इलाहाबाद के म्यूज़ियम के पास से भी गुज़र जाते हैं। बीच में बहुत से नदी-नाले और खेत भी पड़े। कुल मिलाकर ऐसा लग रहा था कि हम किसी एडवेंचर पर निकले हैं। तभी मेरी रूममेट ने आवाज़ दी-पूजा करनी है फैन बंद कर दूं और मेरे सपने पर वहीं विराम लग गया।
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सौदामिनी
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Saturday, August 16, 2008
नौकरी का सौतेलापन, सेलरी का स्यापा
मैं अपने नाटे कद के सठियाए खूसट बॉस के सामने खड़ा हूं...उनकी घूरती नजरें...और मेरी आत्मविश्वास से लबरेज नजरें....रुम में चल रहे एसी में भी आग लगा रही हैं। दिमाग किसी टाइम बम की तरह टिकटिका रहा है...तभी जैसे एक आग का गोला मुझसे छू गया...उन्होंने कहा- तुम्हारी सेलरी तो साढ़े नौ होनी चाहिए...!!?..मेरा जवाब- ''नही, जितनी है उससे भी दुगुनी होनी चाहिए...एक कॉपी राइटर से प्रोड्यूसर का काम करवा रहे हैं आप...और इस पर भी तुर्रा ये कि तुम्हारी सेलरी और कम होनी चाहिए...भई वाह, दूसरों की सेलरी तो डेढ़ गुनी-दुगुनी कर दी...और मेरी घटाने पे तुले हुए हैं...क्या कसूर है मेरा, यही कि आप की किसी भी गलत बात को मैं कुत्ते की तरह दुम हिलाकर सही नहीं कहता...या ये कि मैं अपना काम टाइम पर और बढ़िया तरीके से पूरा करके दे देता हूं...बताइए..''...वो चुप थे...माथा पसीने से तर-बतर हो गया...केबिन से बाहर जाकर टहलने लगे....पता नहीं मैं अपने घर चला गया कि क्या हुआ...मेरी माताजी साड़ी का आंचल कमर में खोंस कर शेरनी की दहाड़ती हुईं मेरा हाथ पकड़े आ रही हैं....बॉस को खूब गरियाते हुए...फिर पूरी दुनिया को....''मेरा ही बेटा मिलता है सताने को...सबको पैसा देते हाथ नहीं दुखता मेरे बेटे को पैसा देते वक्त गां...फटती है...अरे अपने तो महीने में लाखों की गड्डी डकार जाते हो और...............''
अगले सीन में बॉस अपने चिर-परिचित चिरकुट अंदाज में-''हां, भई तो क्या सोचा तुमने, तय कर लो नौकरी करनी है तो साढ़े नौ पे करो...नहीं तो रिजॉइन कर दो हां....'' मेरा दिल धोंकनी की तरह चलने लगा...लेकिन दिल के 1 फुट ऊपर से आवाज आई - हुंह, भाड़ में जा, देख लूंगा...तभी बाहर से किसी की शहद-सी आवाज कानों में पड़ी - ''मैं जा रही हूं दरवाजा बंद कर लो''...अब आंखें खुली...मैं बिस्तर पर था...मन में कहा- थैक्स गॉड, ये सपना था...!
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मिथिलेश श्रीवास्तव
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2:52 AM
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Wednesday, July 30, 2008
नींद की खराशें
एक तेजोमय पुरुष...चेहरे पे दाढ़ी...छोटा कद...(मगर वास्तव में उनका कद काफी ऊंचा है, जिस कंपनी में वो काम करते हैं उसमें वो नंबर दो की हैसियत रखते हैं, काबिल भी हैं) किसी ऊंची जगह पे खड़े हैं...शायद कैंटीन की छत पे..वो भी ऐसी छत कि कैंटीन में जाने का रास्ता वहीं से होकर जाता है। और कैंटीन भी बस लिखा भर है, असल में वो एक ऐसी दुकान है जिसमें हर तरह की चीज मिलती है किसी मिलिट्री कैंटीन की तरह।...कैंटीन वाले की क्लास लग रही है वही दाढ़ी वाले नाटे कद के 'सर' लगा रहे हैं क्लास..मैं दूर खड़ा हूं...मुझे पता है कैंटीन वाले का कोई दोष नहीं...उनके साथ दो लोग और हैं शायद उनके चंगू-मंगू...अचानक वो कैंटीन वाले को नीचे उतारकर पता नहीं कहां ले जाते हैं..कह सकते हैं पिछवाड़े के घने जंगल में...कुछ देर बाद जब लौटते हैं दोनों की शर्ट फटी है...चेहरे पे खरोचें और खून के दाग...मैंने पूछा- क्या हुआ सर'? "कुछ नहीं, कुछ नहीं...बस ऐसे ही..तुम अभी तक यही हो...मैं मन ही मन हंस रहा हूं...कहता हूं- हां सर, मैं अभी तक यहीं हूं, देखते नहीं मैं किन बंधनों में जकड़ा हुआ हूं...वरना...!
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मिथिलेश श्रीवास्तव
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Thursday, July 24, 2008
ऑफिस ने सपने में भी पीछा नहीं छोड़ा
...'गाड़ी है क्या?', मैंने ट्रांसपोर्ट वाले से पूछा।'अरे भइया, अभी दे रहे हैं,ऐसा हुआ है कभी कि आपको गाड़ी ना मिली हो' जवाब मिला।' तब दो जल्दी से' मैंने अपनी तकलीफ दिखाई। रात 09.30 बजे मेरा प्रोग्राम चलता है, आधे घंटे का है। तो मैं अमूमन लगभग सवा दस बजे फ्री हो जाता हूं।...गाड़ी का इंतजार करते-करते एक घंटे बीत गए। इस बीच कई लोगों को उसने गाड़ियां दे दीं. मेरा पारा चढ़ने लगा। उसके अलावा कंपनी के आला कमान को भी कोस रहा हूं।...तभी उसने एक गाड़ी दे दी।..चलो गुस्सा कुछ कम हुआ...मगर रास्ते में ही एक जगह गाड़ी वाले रोक दिया और मुझे और मेरे दो अन्य साथियों को नीचे उतारकर 'हे हे हे...मैडम को छोड़ के अभी आता हूं' कह के चल दिया...मुझे जहां उतारा वो बड़ी वीरान-सी जगह....खैर, आदतन इधर-उधर टहलने लगा...कि अचानक किसी लिजलिजी चीज पर पैर पड़ गया। मैंने चौंककर अपना पैर हटा लिया...देखा तो बुरी तरह नुची हुई एक लाश पड़ी हुई है। अचानक मेरा शरीर और मन सब कुछ हिल गया...मैंने तुरंत मोबाइल निकालकर ट्रांसपोर्ट वाले को फोन मिलाया।....हूक-भर गरियाया...और कहा कि फटाफट गाड़ी भेज नहीं तो आज तेरी खैर नहीं...खैर, गु्स्से का असर हुआ और एक गाड़ी उसने भेज दी. गाड़ी का ड्राइवर नौजवान ही था।...पता नहीं मेरी किस बात से बिदक गया और चलती गाड़ी से कूद पड़ा, अपनी ड्राइविंग सीट छोड़कर...मेरे साथ जो थे उन्होंने कार की ड्राइविंग संभाली और मैं कूद पड़ा उस बददिमाग के पीछे...।पकड़कर बल भर पीटा मैंने उसको....लातों-मुक्कों की जैसे झड़ी लगा दी मैंने...कई सालों बाद हाथ छोड़ा था किसी पर...ले धपाधप ले दनादन कई हाथ लगाए मैंने...सो हाथ की खुजली मिटाने का पूरा मौका था।...तभी न जाने कहां से शख्स आ धमका,...चेहरे पर हल्की-हल्की दाढ़ी थी, हाइट कुछ 5'8" होगी..बेतरतीब बाल...शरीर दुबला लेकिन पेट निकला हुआ...चेहरे पर आत्मविश्वास और घमंड की मिली-जुली चमक...जाना पहचाना ही लग रहा था...बोला- ले चलो स्साले को., पुलिस के डंडे पड़ेंगे तभी होश ठिकाने आएंगे...चल...और उसने सचमुच उसे ले जाकर जेल में पटक दिया...यह पूछते हुए कि क्यों बच्चू मजा आएगा यहां?...जवाब मिला-'हां, यहां तो सब फ्री में मिलेगा...अच्छा है..' तभी आया ने दरवाजे पर दस्तक दी और मेरी नींद खुल गई।
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मिथिलेश श्रीवास्तव
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Thursday, July 10, 2008
धांय..धांय..धांय..धांय
सीन 1-
दौड़ रहा हूं...दौड़ रहा हूं...बस भागे जा रहा हूं...गोलियों की आवाज..धांय..धांय..बच रहा हूं फिर भाग रहा हूं...बहुत संकरी गली..गली के किनारे छोटे-छोटे दरवाजों वाले घर, गली के मुहाने पर दो-तीन बंदूकधारी घेर लेते हैं।...धांय...धांय...बचते बचाते भी एक गोली बांह में लग ही गई...गिरते-पड़ते किसी तरह एक खंडहरनुमा किले में पहुंच गया..बिल्कुल किसी हिंदी सिनेमा की तरह के सीन...
सीन 2-
जमीन पर लेटा हूं...किसी महिला की गोद में...चेहरा स्पष्ट नहीं है...पता नहीं मां है या कोई और...
और डर के मारे चौंक कर नींद खुल गई मेरी...
ये सपना कुछ नहीं तो 10 बार देखा होगा मैंने...जहां तक मुझे याद है पहली बार तब देखा था जब छोटा था करीब 7-8 साल की उम्र में....आज कई दिनों बाद फिर वही सपना आया..एकदम वही तो नहीं लेकिन...किले में मैं कराह रहा था...इतना सीन याद आ रहा है...
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मिथिलेश श्रीवास्तव
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5:22 AM
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Tuesday, June 17, 2008
आपने मारा आरुषि को..आपने.!
''राजेश तलवार ने आरुषि को मारा या एक बाप ने बेटी को मारा, या एक डॉक्टर ने एक इन्सान को मारा, या एक कुकर्मी ने अपना कुकर्म छुपाने के लिए एक बेकसूर को मारा, या एक नौकर ने मालिक की बेटी को मारा, या एक मां ने अपनी बेटी को इज्जत बचाने के लिए मारा, या...या हमने... आपने...हम सबने मारा आरुषि को, वही आरुषि जिसे आज से एक महीने पहले तक आर्कुट से जुड़े कुछ लोग जानते थे, आज पूरा देश जानता है...आरुषि अमर हो गई है लेकिन किस रुप में....मेरे रुप में....मेरे रुप में...हा हा हा हा.....हा हा हा...''....ये आवाज मेरे कानों में गूंज रही थी आज रात अब से कुछ देर पहले तक...नींद उचटने की वजह भी यही थी। सपना ठीक-ठीक तो याद नहीं लेकिन आवाज के शब्द बहुत कुछ ऐसे ही थे...पहले सीन में लगा जैसे मैं जा रहा हूं किसी सुनसान सड़क पर...तभी किसी के रोने की आवाज...रोने के साथ जैसे जोर-जोर से कोई चीख रहा है यही सब बातें। अंत में होने वाली हंसी काफी डरा देने वाली...(अभी भी रोंगटे खड़े हो रहे हैं....)... भयंकर हंसी के बाद फिर रोने की आवाज़.....
मेरा मन काफी रुआंसा हो गया......नींद खुल गई....
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मिथिलेश श्रीवास्तव
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4:08 PM
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